यहां शीर्षक से, आप सभी को थोड़ा बहुत पता चल गया होगा कि मैं क्या लिखने जा रहा हु । जो लोग नहीं जानते उन्हें सोचने की जरूरत नहीं है क्योंकि आज का शीर्षक वही है ए।"विचारहीन कदम" है।
बात मेरी थोड़े पुराने दिनों की है और शायद सुनी हुई भी हो।एक शहर मे एक ड्राइवर और एक कंडक्टर था। दोनों दस साल से साथ काम कर रहे थे। वो मार्ग के हर यात्री को अच्छी तरह से जानता था कि कौनसा यात्री कहा से बस मे चढ़ेगा और कौन सा यात्री कहा उतरेगा। उस समय बस में इतने यात्री आते जाते नहीं थे इसलिए कंडक्टर की जिम्मेदारी कम थी और सभी यात्रियों बस में चढ़कर ही टिकट ले लेते थे। एक दिन साढ़े छह फीट लंबा एक व्यक्ति बस में चढ़ा और सभी यात्रियों और कंडक्टर को देखकर सब दंग रह गए। सब लोग तो ऐसे उसकी और देख रहे थे जैसे उसने कोई बड़ा अपराध किया हो या कोई बड़ा अपराधी हो।
वो भाई बिना एक शब्द बोले पीछे की सीट पर बैठ गया। आज तक, कंडक्टर को पीछे की शीट तक जाने की जरुरत नहीं पड़ी थी क्योंकि सभी यात्रीओ जैसे ही बस मे चढ़ते ही कंडक्टर से टिकट ले लेते थे और सभी यात्री स्थायी यात्री बन गए थे, लेकिन यह साढ़े छह फुट का आदमी पहली बार बस में बैठा था। अब कंडक्टर उठकर पीछे चला गया और उसने पीछे बैठे आदमी से पूछा कि टिकट कहाँ की काटू। और वहाँ बैठे आदमी ने कहा पठान भाई कभी टिकट नहीं कटाते , उस आदमी की आवाज़ में दम था। वह खुद एक ताकतवर आदमी की तरह दिख रहा था और उनके सामने खड़ा कंडक्टर दुबला-पतला और मुश्किल से पाँच फीट लंबा था। वह कंडक्टर उनकी आवाज से थोड़ा डर गया और उसने वहाँ कुछ नहीं बोला और वापस अपनी सीट पर आकर बैठ गया। थोड़ी दूर जाकर पठानभाई का स्टेशन आया और वहाँ वह उतर गए । अब ऐसा हर दिन हो रहा था। हर बार जब कंडक्टर टिकट काटने जाता तो पठान भाई भी यही बात कहते हैं।
'पठान भाई कभी टिकट नहीं कटाते ,
यह सुनते ही कंडक्टर पलट कर वापस अपनी जगह पर आके बैठ जाता। दो महीने तक ऐसा ही चला। इस तरफ l कंडक्टर ने फैसला किया कि इन तीन महीनों में मैं खुद को ऐसा बना दूंगा कि बिना टिकट के मेरे बस में बैठे व्यक्ति मुझसे डरने लगे, इसलिए उसने तीन महीने छुटी पर चला गया और उसने जिम शुरू किया, मार्शल आर्ट सीखा और अपने शरीर को एक मजबूत इंसान की तरह बनाया। तीन महीने में कुछ ही दिन बचे थे लेकिन अब उसमे एक बड़ा बदलाव आया था और अब उसने तय कर लिया था कि पठान को मुझसे टिकट लेना होगा। अब उसके काम पर आने का समय हो गया था। सब यात्री बस में बैठ गये थे। बस दूर तक चली और थोड़ी दूर एक स्टैंड पर खड़ी हो गई। पठान भाई बस मे चढ़े बस थोड़ी दूर चली और कंडक्टर पीछे टिकट लेने आया और बोला आज मे तुम्हे टिकट देकर रहूँगा।
कंडक्टर की आवाज़ आज गूँज रही थी इसलिए पठान थोड़ी देर के लिए चुप हो गया और आज कुछ भी नहीं कहा और कहा कि पठान भाई कभी टिकट नहीं लेते, और अपनी पैंट की जेब से एक बटुआ निकाल कर उसे दिखाया कि मैं एक सरकारी अधिकारी हूँ और मेरे पास एक बस पास है
और यह पास मुझे मेरे स्टाफ के लोगों ने दिया है
यह सुनकर कंडक्टर चुप हो जाता है और अपनी सीट पर बैठ जाता है।
कहानी सुनकर, आप जान सकते हैं कि इस लेख का शीर्षक "बिना सोचे समझे कदम" क्यों है।
यहां कंडक्टर ने कभी नहीं सोचा कि इस आदमी हर दिन टिकट क्यों नहीं लेता था और अगर उसने ऐसा सोचा होता तो उसके दिमाग में एक सवाल जरूर आता होगा कि मुझे उससे पूछना चाहिए कि आप टिकट क्यों नहीं ले ते और फिर उसी समय उसे पता चल गया कि यह एक सरकारी अधिकारी है और उसके पास एक पास है। लेकिन यहां उन्होंने एक विचारहीन कदम उठाया और तीन महीने की छुट्टी ली और आखिरकार असफल रहे।
अपने जीवन में हम बिना सोचे-समझे कुछ निर्णय ले लेते हैं और अंत में हमें इसका परिणाम कुछ नहीं मिलता है।
मैं बस इतना ही कह सकता हूं कि आप बिना सोचे-समझे कभी निर्णय ना ले।
लेख पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद
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